एक नई उद्योग रिपोर्ट का तर्क है कि यदि भारत को अपनी दीर्घकालिक विकास महत्वाकांक्षाएँ बनाए रखनी हैं, तो देश के ऋण पूँजी बाज़ार का उल्लेखनीय विस्तार आवश्यक है।
रिपोर्ट का अनुमान है कि बुनियादी ढाँचे की वित्तपोषण ज़रूरतें बढ़ने के साथ आने वाले दशकों में ग़ैर-सरकारी ऋण-जीडीपी अनुपात मौजूदा स्तर से काफ़ी ऊपर जा सकता है।
बताया जा रहा है कि नीति-निर्माता बैंक ऋण पर निर्भरता घटाने के लिए कॉर्पोरेट बॉन्ड बाज़ार को गहरा करने के उपायों पर विचार कर रहे हैं।